कलेक्ट्रेट व बैठकों में मोबाइल पर पाबंदी, बिना अनुमति वीडियो बनाने पर होगी कार्रवाई

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गोपनीयता और प्रशासनिक गरिमा बनाए रखने के लिए जिलाधिकारी आशीष कुमार भटगाईं का बड़ा फैसला

फरियादियों को बैठक कक्ष से बाहर जमा कराने होंगे फोन; मीडिया और सूचना विभाग को नियम से मिलेगी छूट

पिथौरागढ़। जिले में प्रशासनिक बैठकों और जनसुनवाई की गोपनीयता व संवेदनशीलता बनाए रखने के लिए जिला प्रशासन ने एक बड़ा और कड़ा फैसला लिया है. जिलाधिकारी आशीष कुमार भटगाईं ने कलेक्ट्रेट सभागार, जनसुनवाई कक्ष और तमाम विभागीय बैठकों में अनधिकृत वीडियो रिकॉर्डिंग एवं मोबाइल फोन के उपयोग पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने के सख्त निर्देश जारी किए हैं.

डीएम के इस नए आदेश के बाद अब कलेक्ट्रेट या बैठकों में अधिकारियों से मिलने आने वाले आम लोगों व फरियादियों को कक्ष में प्रवेश करने से पहले अपने मोबाइल फोन बाहर ही सुरक्षित जमा कराने होंगे. प्रशासन का तर्क है कि यह कदम शासकीय कार्यों की गंभीरता, अनुशासन और प्रशासनिक गरिमा को अक्षुण्ण रखने के उद्देश्य से उठाया गया है. अक्सर देखा गया है कि कई लोग जनसुनवाई या बैठकों के दौरान बिना अनुमति के वीडियो रिकॉर्डिंग कर लेते हैं और बाद में उसे आधा-अधूरा सोशल मीडिया पर वायरल कर देते हैं. इससे न सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रियाओं की गोपनीयता प्रभावित होती है, बल्कि संवेदनशीलता पर भी असर पड़ता है.

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नियम तोड़ा तो होगी विधिक कार्रवाई जिलाधिकारी ने उपजिलाधिकारी (एस.डी.एम.) सदर जितेंद्र वर्मा को इन निर्देशों का कड़ाई से अनुपालन कराने के निर्देश दिए हैं. उन्होंने साफ किया कि किसी भी व्यक्ति द्वारा जनसुनवाई, विभागीय बैठकों या प्रशासनिक कार्यवाही की चोरी-छिपे वीडियो रिकॉर्डिंग या मोबाइल से शूटिंग करना पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा. यदि कोई भी व्यक्ति नियमों का उल्लंघन करते हुए पाया गया, तो उसके खिलाफ नियमानुसार सख्त कानूनी कार्रवाई अमल में लाई जाएगी. प्रशासन का मानना है कि इस व्यवस्था से शिकायत निस्तारण की प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित और अनुशासित ढंग से संचालित हो सकेगी.

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मीडिया को रहेगी कवरेज की अनुमति जिला प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि अधिकृत पत्रकारों और सूचना विभाग को इस प्रतिबंधात्मक व्यवस्था से पूरी तरह छूट दी गई है. मीडिया कर्मियों को उनके निर्धारित दायित्वों के तहत आवश्यक कवरेज और फोटोग्राफी की अनुमति पहले की तरह ही रहेगी. इधर, डीएम के इस फैसले के बाद सोशल मीडिया पर भी एक नई बहस छिड़ गई है. कुछ लोग इसे कलेक्ट्रेट के अनुशासन के लिए जरूरी कदम बता रहे हैं, तो कुछ इसे पारदर्शिता के लिहाज से ठीक नहीं मान रहे हैं.

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