पहाड़ी जीवन का अहम हिस्सा है डलिया, पहाड़ की रीति, रिवाज, संस्कृति को जानने का जरिया है डलिया

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आलेख: महिपाल भरड़ा

डलिया, तीन अक्षरों से बना यह शब्द सुनते ही खेतों से घरों को डलिया में घास लेकर लौटती पहाड़ी महिलाओं की तस्वीर जेहन में आती है। इसे डलिया का वास्तविक परिचय भी कहा जा सकता है, लेकिन आपने कभी गौर किया कि डलिया का पहाड़ी जनजीवन में कितना महत्व है। वास्तव में पहाड़ों में बच्चों का पैदा होते ही डलिया से नाता जुड़ जाता है। हालांकि आधुनिक समय में हो रहे बदलाव ने डलिया को हाशिए पर खड़ा कर दिया है, लेकिन एक समय में डलिया का पहाड़ी दिनचर्या में अहम स्थान रहता था।
 पहाड़ों में बच्चों के पैदा होने पर डलिया पालने का काम करती थी। नवजात बच्चे के लिए डलिया ही आलीशान झूले और पलंग का काम करती थी। डलिया में गर्म और नाजुक बिस्तर बिछाकर इसमें बच्चों को सुुलाया जाता था। किसी के नामकरण में जाना हो तो महिलाएं डलिया में बच्चे के लिए खिलौने, कपड़े सहित अन्य जरुरी सामान लेकर जाती थीं। यह रिवाज आज भी कहीं-कहीं पर देखने को मिलता है। खेतों से घास लाना हो या गाय के गोबर को खेतों तक पहुंचाना, ‌डलिया हर जगह काम आती। पहाड़ी जीवन की समृद्ध संस्कृति का परिचायक पर्व भिटौली में भी यदा-कदा डलिया का उपयोग होते देखा जा सकता है। जहां महिलाएं अपनी बेटी के यहां डलिया में ही भिटौली की सामग्री लेकर जाती है। अमूमन भिटौली पर्व पर भाई अपनी बहन के यहां जाता है, लेकिन कुछ स्थानों पर माताएं भी ‌बेटियों के यहां जाती देखी जाती हैं। ऐसे में डलिया ही वह साधन है, जिसमें भिटौली की सामग्री भेजी जाती। इसके अलावा भी डलिया के कई कार्य हैं। पहाड़ी रसोई में डलिया के छोटे रूप टोकरी को आज भी देखा जा सकता है। गर्मागर्म रोटियां बनाकर महिलाएं टोकरी में रख देती हैं। ताकि वह गर्म और ताजी बनी रहे। मनुष्य के जीवन के अंतिम समय में भी डलिया ही काम आती है। अंतिम संस्कार के समय होने वाले क्रियाकर्म में भी अक्सर लोग डलिया में सामग्री रखकर घाट को ले जाते हैं। हालांकि बदलते वक्त ने डलिया का उपयोग भी कम कर दिया है, लेकिन अगर पुराने दौर के पहाड़ी जनजीवन को गौर से देखा जाए तो इसमें डलिया के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है।

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