कड़े संघर्ष से सिल्ली के हेम बन गए साहित्य के ‘उत्तर’, शिक्षण के साथ कुमाउनी के विकास को समर्पित हैं डॉ. दुबे

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राजकीय महाविद्यालय ‌गरुड़ में शिक्षण के साथ कुमाउनी बोली को मुकाम तक पहुंचाने का कर रहे प्रयास, साहित्य जगत में ‘उत्तर’ उपनाम से पहचाने जाते हैं डॉ. दुबे

बागेश्वर। बोली और भाषा किसी क्षेत्र विशेष में रहने वाले की पहचान होती है। हमारे देश में जहां सभी प्रांतों की अपनी बोली और भाषा है। वहीं उत्तराखंड में बोली जाने वाली कुमाउनी, गढ़वाली और जौनसारी को भाषा का दर्जा नहीं मिल सका है। हालांकि कई साहित्यकार अपने स्तर से प्रदेश की बोलियों को‌ लिपिबद्ध करने की पहल में लगे हैं। इन्हीं साहित्यकारों में राजकीय महाविद्यालय गरुड़ में हिंदी के प्राध्यापक डॉ. हेम चंद्र दुबे भी शामिल हैं। डॉ. दुबे को कुमाउनी भाषा से अटूट लगाव है।

गरुड़ के सिल्ली गांव निवासी डॉ. हेम चंद्र दुबे को साहित्य के क्षेत्र में उत्तर उपनाम से जाना जाता है। वर्तमान में कुमाउनी बोली को भाषा का दर्जा और पहचान दिलाने के लिए जिस तरह का संघर्ष चल रहा है, कुछ ऐसा ही संघर्ष डॉ. दुबे को अपना कॅरियर बनाने में लगा था। 1995 में मैरिट अंक हासिल कर परास्नातक परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने पीएचडी की। शिक्षा पूरी करने के बाद उन्हें नौकरी के लिए काफी इंतजार करना पड़ा। उन्होंने निराश होने की बजाय रचना और कहानी लेखन में स्वयं को स‌‌मर्पित कर दिया। वह कहते हैं कि लिखने का शौक स्कूल और कॉलेज के समय से था। संघर्ष ने लेखन को परिपक्वता प्रदान की। इस दौरान उन्होंने कई पत्र-पत्रिकाओं में लेखन किया। कुमाउनी और हिंदी में छोटी-छोटी रचनाएं लिखकर संकलित की। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में भी उनकी रचनाएं प्रकाशित हुईं।

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साल 2002 में उन्हें इंटर कॉलेज में पीटीए शिक्षक के रूप में काम मिला। जिसके बाद उन्होंने अल्मोड़ा, सितारगंज सहित कई स्थानों में रहकर विद्यालयों में अस्थाई शिक्षक के रूप में कार्य किया। वर्ष 2008 में उनका चयन ‌राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय बागेश्वर में संविदा प्राध्यापक के रूप में हुआ। साल 2010 में उन्हें गरुड़ महाविद्यालय स्थानांतरित कर दिया गया। वर्ष 2016 में वह हिंदी के असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर स्थायी हुए।

कुमाउनी और हिंदी की 10 पुस्तकों हो चुकी हैं प्रकाशित

बागेश्वर। डॉ. दुबे अब तक 100 से अधिक कविताएं लिख चुकेे हैं। उन्होंने 18 पुस्तकों में भूमिका लेखन का कार्य किया। उनकी रचित गौ गाड़क पीड़, जिया क्वीड़, पहाड़ पराण, कुमाऊं की सांस्कृतिक विरासत, कुमाउनी संस्कृति के विविध आयाम सहित 10 पुस्तकों का प्रकाशन हो चुका है। वह आकाशवाणी में 26 बार अपनी रचनाएं प्रस्तुत कर चुके हैं। दूरदर्शन के कुमाउनी गोष्ठी में भी उन्होंने कई बार प्रतिभाग किया है। प्रदेश और देश के अलग-अलग राज्यों में होने वाले हिंदी और कुमाउनी के सेमिनारों में भी डॉ. दुबे प्रतिभाग कर चुके हैं।

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लेखन के लिए कई बार हुए सम्मानित

बागेश्वर। कुमाउनी साहित्य लेखन के लिए डॉ. दुबे को भारतेंदु निर्मल जोशी स्मृति कुमाउनी समालोचना लेखन पुरस्कार, गंगा मेहता स्मृति कुमाउनी यात्रा वृतांत लेखन पुरस्कार, बचुलीदेवी रावत कुमाउनी इंटरव्यू लेखन पुरस्कार प्राप्त है। इसके अलावा उन्हें छत्तीसगढ़ शिक्षक साहित्यकार मंच ने हिरदे कविरत्न, ऋचा रचनाकार परिषद मध्य प्रदेश से भारत गौरव, संगम संस्था मध्य प्रदेश से डॉ. उर्मिलेश स्मृति सम्मान, साहित्यिक सांस्कृतिक संस्था गोरखपुर की ओर से काव्यश्री सम्मान, भारतीय दलित साहित्य अकादमी की ओर से ज्योतिबाफुले फैलोशिप, सरस्वती साहित्य वाटिका गोरखपुर की ओर से सरस्वती सा‌हित्य सहित कई अन्य सम्मान प्रदान किए गए हैं।

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मनुष्य के जीवन में मां, मातृभूमि और मातृभाषा का विशेष स्थान होता है। जिस तरह से हम अपनी मां और मातृभूमि के सम्मान को सर्वोपरि रखते हैं, उसी तरह से हमें कुमाउनी के सम्मान के लिए सामूहिक लड़ाई लड़नी होगी। कुमाउनी को लिपिबद्ध और भाषा का दर्जा दिलाने की मुहिम में मैं भी अपना छोटा सा प्रयास कर रहा हूं।

डॉ. हेम चंद्र दुबे, प्राध्यापक/साहित्यकार, राजकीय महाविद्यालय गरुड़

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